24 नवंबर लाचित दिवस : यह दिन महान असमीया योद्धा लाचित बरफुकान की वीरता, कर्तव्यनिष्ठा और देशभक्ति को स्मरण करने के लिए समर्पित है।
( Apurba Das )
24 नवंबर को भारत के असम राज्य में लाचित दिवस (Lachit Divas) के रूप में मनाया जाता है। यह दिन महान असमीया योद्धा लाचित बरफुकान की वीरता, कर्तव्यनिष्ठा और देशभक्ति को स्मरण करने के लिए समर्पित है। लाचित बरफुकान ने 17वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के विरुद्ध असम की स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए अभूतपूर्व शौर्य का प्रदर्शन किया। उनका नाम केवल असम ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के सैन्य इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।
• लाचित बरफुकान कौन थे?
लाचित बरफुकान अहोम साम्राज्य के एक वीर सेनापति थे। उनका जन्म लगभग 1622 ईस्वी में हुआ था। लाचित बरफुकन का जन्म गढ़वाल के पास दिखौ नदी के तट पर हुआ था। उनके पिता मोमाई तामुली बरबरुआ और माता नांग ला चेंग आईदेउ थीं। शिलालेख में मोमाई तामुली बरबरुआ का उल्लेख लान फीमा बरबरुआ के रूप में मिलता है। उनके पूर्वज लुक फिमा नाम के ब्यक्ती 1228 ई. में चाउलुं चौकाफा के सहयात्री के रूप में पाटकाई पार होकर आए थे।
उनके पिता आहोम साम्राज्य के प्रतिष्ठित मंत्री थे, इसलिए बचपन से ही लाचित को प्रशासन, युद्धकला और रणनीति की शिक्षा मिली। अहोम साम्राज्य उस समय पूर्वोत्तर भारत का एक शक्तिशाली और स्वतंत्र राज्य था, जो कई सौ वर्षों तक मुगल साम्राज्य के विस्तार का सामना करता रहा। लाचित बरफुकान को बचपन से ही कर्मठता, अनुशासन और राष्ट्र प्रेम की सीख मिली, जो बाद में उन्हें एक महान सेनानायक के रूप में स्थापित करने में सहायक बनी।
• मुगलों के विरुद्ध अहोम की संघर्ष गाथा
17वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य भारत में सर्वाधिक शक्तिशाली था। असम जैसे स्वतंत्र क्षेत्रों को भी मुगल शासक अपने अधीन लाना चाहते थे। कई वर्षों तक संघर्ष चलता रहा। 1660 के दशक तक मुगलों ने असम की ओर अपना विस्तार बढ़ा दिया था, लेकिन अहोम सेना अपनी स्वतंत्रता बचाने के लिए कटिबद्ध थी। इन्हीं परिस्थितियों में लाचित बरफुकान को अहोम सेना का सेनापति नियुक्त किया गया। वह न केवल युद्धकला में कुशल थे, बल्कि रणनीति, नैतिकता और नेतृत्व में भी उत्कृष्ट थे।
• साराइघाट का युद्ध : लाचित की अमर वीरता
लाचित बरफुकान का नाम सबसे अधिक प्रसिद्ध 1671 में लड़े गए साराइघाट के युद्ध के कारण है। यह युद्ध ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे हुआ था। मुगल सेना का नेतृत्व राम सिंह कर रहा था। मुगलों की सेना विशाल थी, और उनके पास नावों सहित आधुनिक हथियार भी थे। इसके विपरीत अहोम सेना संख्या और साधनों दोनों में कमज़ोर थी। लेकिन लाचित बरफुकान ने अपनी बुद्धिमत्ता और युद्धनीति के बल पर परिस्थितियों को अपने पक्ष में बदल दिया।
• रणनीतिक युद्धकला
लाचित ने ब्रह्मपुत्र नदी का उपयोग अपने लाभ के लिए किया।
उन्होंने नदी के संकरे हिस्सों में युद्ध कराया, ताकि बड़ी मुगल सेना को फैलने का मौका न मिले।
नौसैनिक युद्ध में अश्व, हाथी और भारी तोपखाने का उपयोग सीमित हो गया, जिससे मुगलों की ताकत कम हुई।
लाचित ने गुरिल्ला रणनीति अपनाई—छोटे-छोटे हमले, तेज़ी से हिलना और फिर छिप जाना।
• वीरता का अद्भुत उदाहरण
एक ऐसा समय आया जब लगातार युद्ध के कारण लाचित बीमार हो गए थे। सेनापतियों ने कहा कि बिना उनके सेना कमजोर हो जाएगी। मुगल सेना आगे बढ़ रही थी। इसी स्थिति में लाचित ने कहा—
“मैं अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए मरते दम तक लड़ूंगा। यदि मैं पीछे हट गया, तो असम का अस्तित्व मिट जाएगा।”
बीमारी से कमजोर होने के बावजूद वे अपनी नाव से युद्धक्षेत्र में पहुंचे और लड़ाई का नेतृत्व किया। उनके जज्बे ने असम की सेना में नई ऊर्जा भर दी और अंततः अहोम सेना ने मुगलों को पराजित कर दिया।
साराइघाट का यह युद्ध भारतीय सैन्य इतिहास में दृढ़ संकल्प और समर्पण का सर्वोत्तम उदाहरण माना जाता है।
• लाचित दिवस क्यों मनाया जाता है?
24 नवंबर लाचित बरफुकान की जयंती का दिन है। यह दिन मनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य है—
• असम के लोगों में देशभक्ति और साहस की भावना जगाना।
• युवाओं को यह बताना कि कर्तव्य और राष्ट्रभक्ति सर्वोपरि है।
• एक छोटे से राज्य की सेना ने किस प्रकार एक विशाल साम्राज्य को हराया, यह प्रेरक उदाहरण देना।
• भारत के गौरवशाली सैन्य इतिहास को संरक्षित करना।
• आधुनिक भारत में लाचित बरफुकान की पहचान
आज लाचित बरफुकान को असम के महानायक और राष्ट्रीय वीर के रूप में सम्मानित किया जाता है। भारतीय सेना के राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में हर वर्ष सर्वश्रेष्ठ कैडेट को “लाचित बरफुकान स्वर्ण पदक” दिया जाता है, जिससे उनकी वीरता और नेतृत्व को राष्ट्र स्तर पर सम्मान मिलता है। गुवाहाटी में उनका भव्य स्मारक एवं म्यूज़ियम स्थापित है। स्कूलों, कॉलेजों और सरकारी कार्यक्रमों में लाचित दिवस मनाया जाता है।
लाचित बरफुकान केवल असम के ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के सम्मानित योद्धा हैं। उनके साहस, कर्तव्यनिष्ठा और देश के प्रति निष्ठा ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा नेतृत्व हथियारों की ताकत से नहीं, बल्कि मन के साहस से जीता जाता है। 24 नवंबर का लाचित दिवस हमें यह याद दिलाता है कि स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संघर्ष और बलिदान दोनों आवश्यक हैं।
लाचित बरफुकान भारतीय इतिहास के ऐसे अमर नायक हैं, जिनकी गाथा सदियों तक प्रेरणा देती रहेगी।