ढुलिया भावरिया (ঢুলীয়া ভাৱৰীয়া): विलुप्ति की कगार पर खड़ी असम की अनमोल लोक-नाट्य परंपरा
( Apurba Das)
भारत अपने विविध लोकनृत्यों, संगीत और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए अद्वितीय है। इन्हीं में से एक अनमोल लेकिन खतरे में पड़ी विरासत है असम की “ढुलिया भावरिया” (ঢুলীয়া ভাৱৰীয়া), जिसे सामान्यतः धुलिया, धुलिया नृत्य, धुलिया नाटक या धुलिया भाओना के नाम से भी जाना जाता है। यह लोककला संगीत, ढोल, नृत्य, नाटक, हास्य और भाव-प्रधान प्रस्तुति का अनूठा संगम है। इस कला का प्रचलन असम के कामरूप, नगांव, दरंग, नलबाड़ी, बाक्सा और ब्रह्मपुत्र के उत्तर क्षेत्र के गाँवों में अधिक था।
आज यह परंपरा ऐसी स्थिति में पहुँच चुकी है कि यदि तुरंत संरक्षण नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल पुस्तकों में ही “ढुलिया भावरिया” का नाम पढ़ पाएँगी।
◽ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उद्गम
असम में ढोल (dhol) सदियों से पूजा, त्योहार और सामुदायिक आयोजनों का प्रमुख वाद्य रहा है। ढोल बजाने वाले कलाकारों को “ढुलिया” कहा जाता था। इसी ढोल-केंद्रित प्रस्तुति से “ढुलिया भावरिया” जैसे नाट्य रूप का जन्म हुआ।
कुछ साहित्यिक और शोध स्रोत यह बताते हैं कि इस परंपरा पर श्रीमंत शंकरदेव के वैष्णव भक्ति आंदोलन का भी प्रभाव पड़ा। हालाँकि ढुलिया भावरिया “अंकिया नाट” जैसा धार्मिक नाटक नहीं है, लेकिन इसका ढांचा, कथावाचन और समूह-अभिनय कहीं न कहीं उसी परंपरा से प्रेरित दिखाई देता है।
दूसरी ओर, इतिहासकार डॉ. संजीब बोरकाकोटी ने “Dhepa Dhuliya” जैसी विधाओं का उल्लेख किया है, जिसमें ढोल, मुखौटे, विनोदी अभिनय और नृत्य शामिल थे। यह ढुलिया संस्कृति का ही पुराना रूप माना जाता है।
◽ढुलिया भावरिया की कलात्मक संरचना
ढुलिया भावरिया केवल नृत्य नहीं, बल्कि संगीत + अभिनय + नृत्य + हास्य + कहानी का संयुक्त लोक-नाट्य है।
(1) कलाकारों का समूह (ट्रूप)
एक टीम में 20 से 40 कलाकार तक हो सकते हैं। इनमें शामिल होते हैं—
• प्रमुख ढोलिया (मुख्य ढोल वादक)
• सहायक ढोलिया
• ताल और झांझ बजाने वाले
• “काली” (पवन वाद्य) बजाने वाले
• हास्य पात्र
• कथावाचक
• मुखौटा पहनकर अभिनय करने वाले
• एक्रॉबेटिक कलाकार
• ट्रूप जितना बड़ा होता, प्रस्तुति उतनी ही भव्य होती।
2. वाद्ययंत्रों का महत्त्व
इस परंपरा का मूल ढोल है। ढोल की लय ही कहानी के उतार-चढ़ाव का आधार बनती है। इसके अलावा—
• झांझ (cymbals)
• काली (एक प्रचलित असमिया पवन वाद्य)
• तलताल भी प्रयोग में आते हैं।
3. परिधान (Costume) और मुखौटा (Mask)
Coremango और NEZine की रिपोर्टों के अनुसार, कलाकार
लकड़ी या बांस से बने मुखौटे पहनते हैं, जिनमें—
देवता,दानव,पशु-पक्षी, लोक पात्र —जैसे कई चरित्र शामिल होते हैं।
कपड़े साधारण होते हैं—सफेद या रंगीन धोती, कंधे का वस्त्र, कुछ पैचवर्क वाले वस्त्र और हल्का मेकअप।
4. कहानी और प्रस्तुति का ढांचा
प्रस्तुति कई चरणों में होती है—
• आवाहन — ढोल की तेज लय से शुरुआत
• भगवती वंदना या मंगलाचरण
• कथानक प्रवेश — पात्र एक-एक कर मंच पर आते हैं
• मुख्य अभिनय
• हास्य और व्यंग्य — यह ढुलिया भावरिया की जान है
• सामाजिक संदेश या समापन गीत
ढुलिया कलाकारों की खासियत यह है कि वे स्क्रिप्ट के बिना, केवल लोकज्ञान और मौखिक प्रशिक्षण से पूरी प्रस्तुति तैयार करते हैं।
ढुलिया भावरिया के विषय (Themes)
नाट्य परंपरा में विषय मुख्यतः—
• पौराणिक कथाएँ
• देव-दानव युद्ध
• ग्रामीण जीवन
• त्योहार और फसल
• सामाजिक सुधार
• व्यंग्य और हास्य
• दहेज, शराब, भेदभाव जैसे मुद्दे
ढुलिया प्रदर्शन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने का माध्यम भी था।
◽क्यों विलुप्त हो रही है यह कला?
आज ढुलिया भावरिया को सबसे बड़ा खतरा भूलने और बदलती जीवनशैली से है।
1. डिजिटल मनोरंजन का प्रभाव
टीवी, मोबाइल, OTT और मोबाइल थिएटर के कारण ग्रामीण आयोजन घट गए हैं। लोग अब लंबे समय तक खुले मैदान में बैठकर लोकनाट्य नहीं देखते।
2. आर्थिक संकट
कलाकारों ने स्वीकार किया कि इस कला से जीवनयापन संभव नहीं। नए युवा इसे पेशे के रूप में अपनाने से डरते हैं।
3. पारंपरिक आयोजनों की कमी
पहले विवाह, फसल उत्सव, पूजा और सामुदायिक कार्यक्रमों में धुलिया भावरिया अनिवार्य होता था। आज ऐसे आयोजन आधुनिक DJ, बैण्ड और सिनेमाई संगीत से भर गए हैं।
4. नई पीढ़ी की दूरी
आज के युवाओं की रुचि करियर, नौकरी और डिजिटल कला में है। लकड़ी के मुखौटे बनाना या ढोल साधना उनके लिए व्यावहारिक विकल्प नहीं लगता।
5. सरकारी सहयोग की कमी
कई रिपोर्ट बताती हैं कि इस कला के लिए—
प्रशिक्षण केंद्र
मासिक सहायता
लोक-महोत्सव
डॉक्यूमेंटेशन —बहुत कम हैं।
इसलिए कलाकार धीरे-धीरे अन्य कामों में लग जाते हैं।
इसे कैसे बचाया जा सकता है?
1. सरकारी संरक्षण
• नियमित अनुदान
• कलाकार पेंशन
• राष्ट्रीय और राज्य स्तर के महोत्सव
• धुलिया पर डॉक्यूमेंट्री और शोध प्रोजेक्ट
2. शैक्षणिक संस्थानों में शामिल करना
स्कूलों और कॉलेजों में “लोक-कला प्रशिक्षण” शुरू किया जाए। इससे युवा इस कला से जुड़ेंगे।
3. डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म का प्रयोग
YouTube चैनल, डॉक्यूमेंट्री, सोशल मीडिया अभियान चलाकर धुलिया भावरिया को नई पीढ़ी के सामने लाया जा सकता है।
4. लोक-महोत्सव और सांस्कृतिक यात्राएँ
हर जिले में साल में कम से कम एक “धुलिया महोत्सव” आयोजित हो, ताकि कलाकारों को मंच मिले।
5. मुखौटा कला का पुनरुद्धार
लकड़ी के मुखौटों के कारीगर लगभग समाप्त हो चुके हैं। इस शिल्प को भी साथ-साथ बचाना जरूरी है।
ढुलिया भावरिया असम की सांस्कृतिक आत्मा का ऐसा हिस्सा है जिसे किसी भी कीमत पर खोया नहीं जाना चाहिए। यह केवल एक नृत्य या नाटक नहीं, बल्कि ग्रामीण असम की आवाज, उनके हास्य, संघर्ष, देवत्व, परंपरा और सामुदायिक एकता का प्रतीक है।
आज यह कला सचमुच विलुप्ति की कगार पर है—लेकिन यदि समाज, सरकार और युवा मिलकर प्रयास करें, तो ढुलिया भावरिया एक बार फिर असम के गाँवों और सांस्कृतिक मंचों पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा सकती है।