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বিজ্ঞাপন

मामोनी रैसोम गोस्वामी की "दाटल हाथी का दीमक-खाया हुआ दैहार”




( 19 November , आज मामोनी रॉयसोम गोस्वामी की पुण्यतिथि है। Good Assam की तरफ से श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। )


मामोनी रैसोम गोस्वामी की "दाटल हाथी का दीमक-खाया हुआ दैहार”

( Apurba Das )

“दाटल हाथीर उने खोहा हौदाह” असम के प्रसिद्ध साहित्यकार ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता ममोनी रैसोम गोस्वामी का सबसे चर्चित और मार्मिक उपन्यास है। यह केवल हाथियों की कहानी नहीं, बल्कि असम के उन महावतों, कामगारों और जंगल से जुड़े जनजीवन का गहरा चित्रण है जिनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी हाथियों, जंगलों और कठिन परिस्थितियों में बीतती है। कहानी में मनुष्य और पशु के बीच का भावनात्मक संबंध एक मुख्य धारा के रूप में उभरता है।


◽कहानी की पृष्ठभूमि

उपन्यास असम के जंगलों और वहां काम करने वाले महावतों (हाथी चलाने वाले लोगों) की ज़िंदगी दिखाता है। इन जंगलों में सरकारी ‘फॉरेस्ट कैंप’, हाथियों की देखभाल, उनसे लकड़ी ढोने का काम और उनके साथ रहने वाले लोगों के संघर्ष पूरे उपन्यास में प्रमुख रूप से उपस्थित हैं। कहानी यथार्थवादी है और यह दिखाती है कि कैसे हाथियों और मनुष्यों का जीवन एक-दूसरे पर पूरी तरह निर्भर है।




◽मुख्य पात्र

दाटल हाथी – एक मजबूत, अनुभवी, किंतु घायल और थका हुआ हाथी।

गिरिधर – दाटल का महावत। संवेदनशील, दयालु और हाथियों से गहरा रिश्ता रखने वाला व्यक्ति।

फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के अधिकारी – जिनके आदेशों और नीतियों का प्रभाव हाथियों और महावतों के जीवन पर पड़ता है।

महावत समुदाय – जंगलों में रहने वाले गरीब लोग जिनकी रोज़ी-रोटी केवल हाथियों पर निर्भर है।


◽कहानी का सार

1. हाथियों का कठोर जीवन और जंगल का यथार्थ

कहानी की शुरुआत जंगल के कठोर जीवन से होती है। महावत अपने हाथियों को सुबह-सुबह नहलाते, खिलाते और काम के लिए तैयार करते हैं। हाथी केवल जानवर नहीं, बल्कि उनके साथी, रक्षक और रोज़गार का साधन हैं। दाटल हाथी इन सबमें सबसे अनुभवी और मजबूत माना जाता है।

कहानी में बार-बार दिखाया गया है कि जंगल का जीवन कितना कठिन है—न खाना समय पर मिलता है, न दवाई, और न ही किसी तरह की आधुनिक सुविधा। हाथियों पर भी दिनभर लकड़ी ढोने और भारी काम करने का दबाव होता है।

2. दाटल हाथी का चरित्र

दाटल हाथी एक तरह से उपन्यास का नायक है। वह बूढ़ा हो चुका है, उसका शरीर जख्मों से भरा है, पर फिर भी उसे काम के लिए मजबूर किया जाता है। उसके साथ-साथ महावत गिरिधर भी स्वयं संघर्ष कर रहा है। उसे सरकारी अधिकारियों के आदेशों का पालन करना पड़ता है, भले ही वह हाथियों की हालत समझता हो।

3. हौदाह (Howdah) का प्रतीक

“हौदाह” हाथी की पीठ पर लगाया जाने वाला वह मजबूत लकड़ी का ढांचा होता है जिसमें बैठकर लोग यात्रा करते हैं या सामान रखा जाता है।

उपन्यास में “खाया हुआ हौदाह” प्रतीक है—

• टूटी हुई व्यवस्था का
• शोषण का
• हाथियों और महावतों के धीरे-धीरे खत्म होते जीवन का

दाटल के टूटे हुए हौदाह से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि जंगल का जीवन अब थक चुका है, टूट चुका है और मौत की ओर बढ़ रहा है।





4. मनुष्य और हाथी का भावनात्मक रिश्ता

गिरिधर और दाटल के बीच एक गहरा रिश्ता है।
गिरिधर दाटल के दर्द को समझता है—उसकी थकान, उसके घाव, उसका मानसिक बोझ। वह कई बार दाटल के लिए अधिकारियों से आराम मांगता है, लेकिन उसकी बात को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। अधिकारियों के लिए हाथी मशीन हैं, भावनाओं वाले जीव नहीं। कहानी का यह हिस्सा मनुष्य-पशु संबंधों का बेहद संवेदनशील चित्र बनाता है।

5. दर्द, शोषण और उपेक्षा

कहानी धीरे-धीरे दिखाती है कि बुजुर्ग हाथी दाटल अब काम करने की स्थिति में नहीं है।
लेकिन फॉरेस्ट ऑफिसर का आदेश है कि लकड़ी ढुलाई का काम बंद नहीं होना चाहिए।
इसका सीधा अर्थ है—दाटल को अपनी आखिरी सांस तक काम करना होगा।

दाटल बार-बार गिरता है, उसके पैर काँपते हैं, उसकी सांस धौंकनी की तरह चलती है।
गिरिधर उसे समझाता है, दुलारता है, लेकिन उसकी मजबूरी है कि आदेश की अवहेलना नहीं कर सकता।

यही मजबूरी पूरे उपन्यास की सबसे कड़वी सच्चाई है।

6. दाटल का ढहना—कहानी का सबसे मार्मिक दृश्य

उपन्यास का सबसे दर्दनाक क्षण वह है जब दाटल काम करते-करते अचानक ढह जाता है। उसका विशाल शरीर जमीन पर गिरता है, हौदाह टूटकर एक तरफ लटक जाता है। उसकी आंखों में दर्द होता है, लेकिन साथ ही राहत की एक हल्की चमक— जैसे उसे पता हो कि अब उसे कभी काम नहीं करना पड़ेगा। गिरिधर दौड़कर उसके पास आता है, उसे सहलाता है। उसके सामने उसका साथी, जो उसके जीवनभर साथ रहा, अब मौत के कगार पर है। यह दृश्य मानो मनुष्य की विवशता और पशुओं के शोषण का अंतिम रूप है।

7. अधिकारियों की बेरुखी

दाटल की हालत देखकर भी अधिकारी संवेदनाहीन नजर आते हैं।
वे उसे पैसा और काम की इकाई के रूप में देखते हैं।

उनका सवाल यही रहता है—
“अब लकड़ी ढोने का काम कौन करेगा?”
न हाथी की मौत का दुख, न महावत के दर्द की समझ। यह उपन्यास पूरी सरकारी मशीनरी की क्रूरता को बेनकाब करता है।

8. दाटल की मौत

अंततः दाटल की मृत्यु हो जाती है।
उसकी मौत केवल एक हाथी की मौत नहीं—
बल्कि जंगल की संस्कृति, महावतों की परंपरा और मनुष्य-पशु संबंधों की एक विरासत का पतन है। गिरिधर टूट जाता है।
उसे लगता है कि उसने अपने साथी की रक्षा नहीं कर पाई।
लेकिन वह जानता है कि असली दोष उसका नहीं, उस व्यवस्था का है जो श्रम और संवेदना की कीमत नहीं समझती।

उपन्यास का मुख्य संदेश : जानवर भी भावनाओं वाले जीव हैं, मशीन नहीं। शोषण केवल मनुष्यों का नहीं, पशुओं का भी होता है।
व्यवस्था की लापरवाही और अमानवीयता जंगल के जीवन को बर्बाद करती है। महावतों की जिंदगी बेहद कठिन और अवमूल्यित है। प्रकृति और मनुष्य के संबंध आधुनिक व्यवस्था में धीरे-धीरे टूट रहे हैं।


“दाटल हाथी का दीमक-खाया हुआ दैहार” एक बेहद भावनात्मक और यथार्थवादी उपन्यास है जो हाथियों और उन्हें संभालने वाले मनुष्यों की पीड़ा को उजागर करता है।

यह केवल एक हाथी की कहानी नहीं, बल्कि शोषण, सामाजिक अन्याय और मानवीय संवेदना की कमी का दस्तावेज है।
दाटल की मौत पाठक के मन में गहरा असर छोड़ती है और यह अहसास करवाती है कि प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता कितना नाजुक है और हम उसे कैसे टूटने दे रहे हैं।

उपन्यास को पढ़कर मैं अपने आँसू नहीं रोक पाया। मेरे सीने में एक असहनीय दर्द हो गया हैं...!
कुछ देर के लिए मेरी आवाज़ धीमी हो गई...




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