लाचित बरफुकान ने अपने मामा को क्यों मार दिया?
(Apurba Das )
लाचित बरफुकान असम के एक ऐसे महान सेनानायक थे, जिनकी वीरता, कर्तव्यनिष्ठा और अनुशासन आज भी इतिहास में अद्वितीय माने जाते हैं। उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग है अपने ही मामा (मातुल/मातृकाका) को दंड देना, जो उनके सिद्धांत— “देश से बड़ा कोई नहीं, न रिश्ता, न परिवार” को प्रकट करता है।
यह घटना केवल कठोर निर्णय का उदाहरण नहीं, बल्कि यह दर्शाती है कि लाचित बरफुकान के लिए कर्तव्य और राष्ट्र की रक्षा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थी।
• घटना की पृष्ठभूमि
साल 1670 के आसपास, जब मुगल साम्राज्य असम की ओर बढ़ रहा था, तब अहोम साम्राज्य ने लाचित बरफुकान को मुख्य सेनापति नियुक्त किया था। युद्ध की तैयारी के लिए उन्हें तेजी से किलेबंदी, मिट्टी के बांध, दीवारें और सुरक्षा संरचनाएँ बनानी थीं। इसके लिए सेना और श्रमिक दिन-रात कार्य कर रहे थे।
लाचित के मामा उस समय सेना और निर्माण कार्यों की देखरेख से जुड़े एक उच्च अधिकारी थे। उन्हें किले की एक महत्वपूर्ण दीवार बनवाने का दायित्व सौंपा गया था, जो मुगल सेना की घुसपैठ रोकने के लिए अत्यंत आवश्यक थी।
• मामा की बड़ी गलती
जब लाचित निरीक्षण करने पहुंचे तो उन्होंने देखा कि—
किले की दीवार का निर्माण अधूरा था, काम अपेक्षा के अनुरूप नहीं हुआ था। मामा ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए कार्य में लापरवाही की थी। कुछ अधिकारी मामा के दबाव में काम टाल रहे थे। युद्ध की तैयारी में धीरेपन से पूरा राज्य जोखिम में पड़ सकता था। यह स्थिति बेहद गंभीर थी। युद्ध किसी भी क्षण शुरू हो सकता था, और किले की कमज़ोर दीवार सेना की हार का कारण बन सकती थी। लाचित के लिए यह केवल एक निर्माण में कमी नहीं थी, बल्कि राज्य और जनता की सुरक्षा से खिलवाड़ था।
• लाचित बरफुकान का कठोर निर्णय
जब उन्होंने अपने मामा से प्रश्न किया कि कार्य में ऐसी लापरवाही क्यों हुई, तो मामा ने बहाना बनाते हुए कहा कि—
“मैं तुम्हारा मामा हूँ, इतनी कड़ाई क्यों?”
मामा समझते थे कि रिश्ते के कारण लाचित को नरमी बरतनी चाहिए। लेकिन लाचित ने तुरंत अपने सिपाहियों को आदेश दिया कि—
“जो अपने कर्तव्य में लापरवाही करे, वह चाहे मेरा मामा ही क्यों न हो, उसे दंड मिलेगा।”
और उन्होंने अपने गणराज्य की सुरक्षा और कर्तव्य के लिए अपने ही मामा को मृत्यु का दंड दे दिया।
यह घटना इतिहास में अमर है।
• लाचित बरफुकान का प्रसिद्ध वाक्य
घटना के बाद लाचित बरफुकान ने कहा:
“देश के हित से बढ़कर कोई नहीं।
देश से बड़ा मेरा मामा भी नहीं हो सकता।”
इस वाक्य का अर्थ था कि—
कर्तव्य सर्वोपरि है
राष्ट्रहित पहले आता है
निजी रिश्तों, भावनाओं से बड़ा सुरक्षा का ध्येय है
नेतृत्व में पक्षपात नहीं होना चाहिए
• यह घटना इतिहास में क्यों महत्वपूर्ण है?
1. अनुशासन का सर्वोच्च उदाहरण
नेता जब नियम तोड़ते हैं, तो पूरी सेना ढीली हो जाती है। लाचित ने दिखाया कि कर्तव्य में लापरवाही किसी भी कीमत पर नहीं चल सकती।
2. राष्ट्र प्रथम, रिश्ते बाद में
युद्ध में निजी संबंध महत्वहीन होते हैं। देश की सुरक्षा सर्वोपरि होती है।
3. न्याय और समानता
उन्होंने सिखाया कि दंड अपराध के आधार पर मिलेगा, न कि रिश्ते के आधार पर।
4. नेतृत्व में साहस
अपने ही रिश्तेदार को दंड देना आसान नहीं था। लेकिन नेतृत्व में कठोर निर्णय लेने होते हैं, भले वे दर्दनाक हों।
5. यह घटना उनकी महानता का प्रतीक बनी
लोगों ने देखा कि उनका सेनापति नियमों में किसी प्रकार का पक्षपात नहीं करता। इससे सेना में उन्हें लेकर विश्वास कई गुना बढ़ गया।
साराइघाट के युद्ध में इसकी भूमिका
मामा की घटना के बाद-
• सेना अनुशासित हुई
• तेजी से किलेबंदी पूरी हुई
• युद्ध की तैयारी अत्यंत प्रभावी हो गई
• सैनिकों में नेतृत्व के प्रति सम्मान और विश्वास बढ़ गया
• इसी कठोर अनुशासन ने 1671 में साराइघाट के युद्ध में मुगलों पर ऐतिहासिक विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लाचित बरफुकान का यह प्रसंग न केवल उनकी कठोरता दिखाता है, बल्कि यह भी बताता है कि—
“सच्चा नेता वह है जो व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रहित के लिए निर्णय ले।”
उनकी यह सीख आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। किसी भी समाज या देश का निर्माण तभी संभव है जब उसके नेता नियमों का पालन स्वयं उदाहरण बनकर करें।
लाचित बरफुकान हमें यह सिखाते हैं कि—
“देश पहले, परिवार बाद में।”
और यही कारण है कि उनका नाम सदियों बाद आज भी आदर और सम्मान से लिया जाता है।